राजनीतिक बयान | महिला आरक्षण पर घमासान
(प्रेस वार्ता के दौरान सुनील कुमार शुक्ल)
सदन में महिला आरक्षण को लेकर किसी भी पार्टी की नियत साफ नहीं — सुनील कुमार शुक्ल
कुशीनगर/नई दिल्ली:
महिला आरक्षण को लेकर देश की राजनीति में जारी बहस के बीच हाईकोर्ट इलाहाबाद के अधिवक्ता एवं पूर्व सांसद प्रत्याशी सुनील कुमार शुक्ल ने सभी राजनीतिक दलों की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम), जिसे सितंबर 2023 में संसद द्वारा पारित किया गया था, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान करता है। यह 106वां संवैधानिक संशोधन है।
शुक्ल ने दावा किया कि 17 अप्रैल 2026 को यह संशोधन बिल लोकसभा में आवश्यक बहुमत न मिलने के कारण पारित नहीं हो सका, जो राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को दर्शाता है।
“अगर नीयत साफ होती तो पार्टियां टिकट वितरण में ही 33% या 50% महिलाओं को मौका देतीं”
उन्होंने कहा कि आज आरक्षण को एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है—
👉 कोई महिला आरक्षण की बात करता है
👉 कोई मुस्लिम या ओबीसी आरक्षण की
👉 जबकि एससी/एसटी आरक्षण पहले से लागू है
शुक्ल ने आरोप लगाया कि राजनीतिक दल केवल हंगामा खड़ा कर अपनी “राजनीतिक रोटियां सेंकने” में लगे हैं, जबकि देश के असली मुद्दे—खासतौर पर आर्थिक समस्याएं—सदन में चर्चा से दूर हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि जब युवा नेता इस मुद्दे को मजबूती से उठाने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें भी बोलने से रोका जाता है।
आर्थिक आधार पर नीतियों की जरूरत
शुक्ल ने जोर देकर कहा कि जब तक देश में नीतियां आर्थिक आधार पर नहीं बनेंगी और समाज की वास्तविक समस्याओं को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक आरक्षण के नाम पर समाज में विभाजन और राजनीति जारी रहेगी।






